ठहर गई गोबर की गंध !

मां गूंथ देती दो चोंटी मोटी वाली, काट देती है बड़े होते से नाख़ून,
लगा देती है रोज़ कान के पीछे काजल,बचाती दुनिया की नज़र से.


नहीं देखा उसने कभी फैशन शो.. जहां रैंप पर चलती हैं लड़कियां…
नहीं पहनी उसने कभी जींस और शॉर्ट्स.

नहीं लगाया कोई शैंपू और न माथे पर कोई सिरम…
चली जाती है सरकारी स्कूल वो दौड़ते-दौड़ते.

गांव की सारी गलियां और घर पता है उसे सहेलियों के.
त्यौहार पर लगाती है दीये, बनाती गोबर से ‘संजा’ दीवारों पर,

कच्चे से मकान में कुछ कवेलू करती ठीक, हाथ बंटाती मां का,
उठाया गोबर उसने गाय का.. और थेप दिए कंडे.

सुंदर हथेलियों में ठहर गई थी गोबर की गंध..
हाथ में लिया टिफिन बाबूजी का और चल दी अल्हड़ सी चाल

खेत की मेढ़ और बल खाती, झुलाती चली जाती रोज़ टिफिन वो.
मुस्कुराती वो गांव की बेटी.. शहर की दुनियादारी से बेखबर….

चोटियों को झटक, इतरा कर लौटती है वो घर हर शाम.
हां, देखती है वो भी सपने मन के मुट्ठी भर आकाश,
और लिपट जाती मां से… मां फिर काजल लगाती है.

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