सुनो,
ये खत.. ये खत है।
नहीं कोई कागज़ का पुलिंदा हैं।
इन खतों में,
तू इत्र है, महक है, अहसास है,
बातें वो दर्ज़ जो तेरी खास हैं।
इन खतों में,
तू मतला है, मुक्तक है, छंद है,
वो तेरे वादे, तेरे अनुबंध हैं।
इन खतों में,
तू गिला है, शिकवा है, शिकायत है,
ऋचा है, चौपाई है, आयत है।
इन खतों में,
तू उम्मीद है, तू आरज़ू है,
टूटे से मन की मज़बूत बाजू है।
इन खतों में,
तू है, तेरा रूठना है, मनाना है,
कुछ सूखे गुलाब और गुज़रा ज़माना है।
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