मन का ‘नोबेल’

पिछले कई दिनों से मन कसमसा रहा था. विचार मन पर दस्तक देते, कुछ कहने की चेष्टा करते. मैं ठिकता,सोचता और फिर आगे बढ़ जाता.
पिछले कई वर्षों के अखबार, चैनल्स और सोशल मिडिया से जुड़ी इस ज़िंदगी में लिखता रहा. शायद हज़ारों में होगी मेरी लिखी स्टोरीज़, फीचर,और कवर स्टोरीज़, मार्मिक घटनाएं, उत्सव,और राजनितिक सरगर्मियां, आर्टिकल्स …. यहां तक कि लाइव कवरेज भी.


इन सब में एक बात कॉमन है वह समय प्रबंधन, शब्दों की सीमाएं, संस्थाओं के बनाए उसूल. इन संस्थाओं से मिले प्लेटफॉर्म से ही कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल गए. पत्रकारिता की इस यात्रा में कई दौर देखे और देख रहा हूं.

इन उपलब्धियों के बीच सक्रीय पत्रकारिता की अपनी व्यस्तताएं रहती हैं. हम अपनों से भी मिलना तो दूर खास मौकों पर भी उपलब्ध नहीं होते.
बात वही… फिर इतनी उपलब्धियां (समाज की नज़र में) के बाद भी मन में विचार क्यों अलग दस्तक देते हैं. क्यों मन कसमसाता है!
शायद यह ज़िंदगी है ही नहीं. ये बाहरी उपलब्धियां आंतरिक मन में मायने नहीं रखती.


इस बीच एक दोस्त ने कहा खुद का लिखो. जो मन कहे वह लिखो. और यह कोई एक बार नहीं कई बार कहा उसने.

जब भी बात हो एक ही सवाल-“खुद का कब लिखोगे”
चाय की चुस्की के साथ ही दोस्त ने इस बार तो तारीख तक पूछ ली-“क्या हुआ लिखने का ??
“बस जल्दी ही.” मैंने सॉलिड तरीके से कहा.
“उफ्फ..तो शुरू करो.”
और लीजिए मन की दस्तक मित्र की हिदायत आकार लेने लगी.
कई दिन के मंथन और सुझाव के बीच तय हुआ जब लिखना ही है तो स्याही भी मेरी हो.
और ब्लॉग का नामकरण फ़ाइनल हुआ… “Vivek My Ink”

Vivek My Ink.in – में कुछ खाने बनाए. आखिर इस ब्लॉग में क्यों कुछ सिग्मेंट बनाए, ये भी समझ लीजिए.
My Self” यह जरुरी था.आप मुझे जान पाएंगे. मेरी यात्रा, मेरा पड़ाव.

My Ink” -ये ब्लॉग है.इसमें मैं अपने मन का लिखना चाहता हूं, जिसे आप पढ़ना चाहते हैं. समाज के अंदर घटित और मन के विचारों से ये आंगन आप और हम मिल कर सजाएंगे.
सम-सामायिक मुद्दों पर बात कर सकूं, आपकी प्रतिक्रिया जान सकूं. बस.
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सबरंग” – जीवन में ऑफबीट सीन देखकर हमेशा ही मेरी नज़र ही नहीं मैं खुद ठहर गया. कई तस्वीरों ने अंदर तक झकझोर दिया तो कभी मन पर गहरी छाप छोड़ी. मैं प्रोफेशनल कैमरापर्सन तो नहीं लेकिन जो भी क्लिक मोबाइल से किए या करता हूं… आपको समय- समय पर साझा करता रहूंगा. सारे रंगों से मिलकर बना हमारा “सबरंग”. इसमें मन के इंद्रधनुष होंगे तस्वीरों के माध्यम से.. सात रंगों से भी ज्यादा मन का एक रंग और…
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अल्फ़ाज़ की चौपाल” – ये किसी बड़े होटल के हॉल नहीं. नहीं ऐसी कोई चर्चा या सेमिनार या खुलकर कहूं तो कोई ज्ञानवार्ता.
बस ये तो मेरी चौपाल है. जहां आपकी और मेरे संवादों में छिपे शब्द या अल्फ़ाज़ की मुलाकात है. कभी किसी पुस्तक पर कोई चौपाल तो कभी आपसे ही हुई बात इस चौपाल में रंग जमाएगी. मुद्दे छोटे हों, जिसे हर कोई नज़रअंदाज़ कर रहा वह होगा हमारी चौपाल का हिस्सा.
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बिखरे पन्ने” – शायद शीर्षक पढ़कर आपको भी लगेगा बिखरे पन्ने!!! जी. सही ही लिखा. अब तक न जाने कितने मन में घुमड़ते विचार आंदोलित हुए तो कभी भावुक.. जहां पन्ना दिखा, लिख दिया.शायद ये पन्ने सैकड़ों में होंगे.बस ये पन्ने कभी टेबल की ड्रॉज़ तो कभी ऑफिस की रद्दी तो कभी लापरवाही का शिकार होकर बिछड़ गए.
जिन दोस्त ने पढ़ा मेरा लिखा हुआ चाहे आधा-अधूरा.. शायद उन्हें पसंद आया.
सौंदर्य कम और सामाजिक ताना-बाना, विसंगतियां और भी कुछ मेरी लिखावट में ज्यादा जगह घेरती रही. मेरा पसंदीदा विषय रहा.
अब लाज़मी है दोस्त की बात टाली नहीं जा सकती. सोचा नई शुरुआत की तो इन बिखरे पन्नों पर फिर कुछ लिखा जाए.. लेकिन इन पन्नों को समेटने और संभालने की जवाबदारी आप पर छोड़ता हूं. बिखरे पन्ने में शायद आप ही कहीं खुद को तलाश लें.
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और अंत में…..

ये जो भी ब्लॉग और सिग्मेंट के बहाने लिखा.. वह पहला निजी प्रयास है. मेरी लिखावट और विचारों का नया जन्म है.
सच मानिए ये ब्लॉग भी मेरे मन में और मंथन में, लगभग नौ माह से पल रहा था. दोस्त और शुभचिन्तकों का धन्यवाद जिन्होंने मुझे ये रास्ता दिखलाया.
सुना है इस दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक नोबेल पुरस्कार को माना गया. इसी नोबेल अवार्ड में शांति नोबेल पुरस्कार भी है जो दुनिया में शांति के लिए किए गए प्रयासों और सेवाओं के लिए दिया जाता है.
और सच मानिए… आज तक जो भी लिखा वह घटना या असाइनमेंट बतौर लिखा. इसमें मेरा सिर्फ लिखावट का हिस्सा था, मन का नहीं. न कोई सुकून था.


ये ब्लॉग आपका-अपना है. सामूहिक मालिकाना हक़. है आपका और हमारा.
मेरा लिखना और आपकी प्रतिक्रिया इसे पूर्ण स्वस्थ बनाएगी.
ये कह लीजिए ये मन का सुकून है…. आपका और हमारा मन का नोबेल है… जी नोबल पुरस्कार है जो मन के हाथों मिल रहा.
आप इस my Ink का हाथ थामे रहिए…..
आमीन.

आपका
विवेक

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