
मासूम
साथ अंधेरे के जगकर वो रात बिताता है।बारातों में बस सर पर कंदील उठाता है।छुट्टी होती है तो बजती है इक घंटी,उस मासूम का शाला से बस इतना नाता है।होता है क्या स्वाद आज तक जान नहीं पाया,बस दावत में पकवानों की खूश्बू खाता है।अपनी फटी कमीज से ढंककर अपना चेहरा,सुट बूट वालों से ख़ुद को रोज छिपाता है। 🍁🍁🍁🍁🍁








