बिखरे पन्ने

मासूम

साथ अंधेरे के जगकर वो रात बिताता है।बारातों में बस सर पर कंदील उठाता है।छुट्टी होती है तो बजती है इक घंटी,उस मासूम का शाला से बस इतना नाता है।होता है क्या स्वाद आज तक जान नहीं पाया,बस दावत में पकवानों की खूश्बू खाता है।अपनी फटी कमीज से ढंककर अपना चेहरा,सुट बूट वालों से ख़ुद को रोज छिपाता है। 🍁🍁🍁🍁🍁

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अलग रवानी है

तेरे अल्फ़ाज़ों की कुछ अलग रवानी है,अहसासों की महक कुछ अलग कहानी है,तू ही बता रिश्तों का क्या नाम दें अब….मेरे साथ तेरा नाम लोगों को ज़ुबानी है। 🍁🍁🍁🍁🍁

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ख़ुशी बन जाऊं

मन करता तेरी ख़ुशी बन जाऊं,फूल यदि हो तो खुश्बू बन जाऊं,जिस रस्ते से भी तुम गुज़रो…,वह पगडंडी ……. मैं हो जाऊं। 🍁🍁🍁🍁🍁

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हो गई मन की पूजा

गर्म हवा, पतझड़ में खिल गए पलाश हैं,हो गई मन की पूजा,पढ़ ली नमाज़ है.तितलियों के पंखों पर देख ली चित्रकारी,देख बूंदें ओस की कलियां भी मुस्कुरा ली.हो गई मन की पूजा…सागर की लहरों में ज़िंदगी है जो तिनका,कैसा भंवर, कैसी फिकर, जो वही पतवार है.हो गई मन की पूजा…जाती रही दिनभर की थकन,बेटी जो शाम कंधे पर सवार है.हो गई मन की पूजा…न देखा काबा, न देखा शिवाला,देखूं मजदूर का बेटा वही मुरली, वही कन्हाई है.हो गई मन की पूजा…फंसती है ज़िंदगी, उखड़ती है सांसेउदासी में रख देता कांधे पर कोई हाथ है.हो गई मन की पूजा….पढ़ ली नमाज़ है. 🍁🍁🍁🍁🍁

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रिश्तों की बगिया !

कर रहा हूं बागवानी आजकल,रिश्तों के बगिया की…तोड़ रहा सूखे पत्ते रिश्तों के.और,काट दी कई टहनियां जो बन रही थी बाधाएंहटा दी मैंने क्यारियों की खर-पतवार,जो पनप ने नहीं दे रही महकते रिश्तें को.सड़ांध मारने लगे थे ये सूखे पत्ते और उलझी शाखाएं.हटा दी हरी काई जहां फिसलने लगे भरोसे के पैर…इस छटाईं से दिखने लगा खूबसूरत रिश्तों का बगीचा.खिलने लगे संवादों के फूल,मुस्कान की कलियां…महकने लगा बगीचा जैसे कोई महके जूही-मोगरा और रजनीगंधाजैसे कोई खड़ा हो गुलाबों सा रिश्तों का गुलदाता लिए 🍁🍁🍁🍁🍁

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मन का वास्तु !

4 साल का मासूम बेटा रोज़ लौटता है स्कूल से,कर देता मां की हिदायतों को दरकिनार.ले आता आधा खाली आधा भरा टिफिन.होम वर्क का पूछते ही निकाल लेता रंगीन पेंसिलें..और बन जाता है टीचर.चढ़ जाता है बेड पर नन्हें पैरों से..और चितरने लगता दीवारों को.अरे..अरे ! अभी तो कराया कलर दीवारों पर,पलटता वो मासूम और टीचर की छवि में चुप करा देता है मुझे.चमकती दीवारों पर रोज़ चितरता…बना देता है मन चाहे नक़्शे.कभी तितली तो कभी खिलता गुलाब…कभी बना देता टेड़ा-मेढ़ा सा कृष्ण का मोर पंख.भूल जाता हूं मैं कलर का हिसाब,बिल और सब कुछ…गले लगता है और जैसे ठीक कर रहा वो मन का वास्तु. 🍁🍁🍁🍁🍁

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ठहर गई गोबर की गंध !

मां गूंथ देती दो चोंटी मोटी वाली, काट देती है बड़े होते से नाख़ून,लगा देती है रोज़ कान के पीछे काजल,बचाती दुनिया की नज़र से. नहीं देखा उसने कभी फैशन शो.. जहां रैंप पर चलती हैं लड़कियां…नहीं पहनी उसने कभी जींस और शॉर्ट्स. नहीं लगाया कोई शैंपू और न माथे पर कोई सिरम…चली जाती है सरकारी स्कूल वो दौड़ते-दौड़ते. गांव की सारी गलियां और घर पता है उसे सहेलियों के.त्यौहार पर लगाती है दीये, बनाती गोबर से ‘संजा’ दीवारों पर, कच्चे से मकान में कुछ कवेलू करती ठीक, हाथ बंटाती मां का,उठाया गोबर उसने गाय का.. और थेप दिए कंडे. सुंदर हथेलियों में ठहर गई थी गोबर की गंध..हाथ में लिया टिफिन बाबूजी का और चल दी अल्हड़ सी चाल खेत की मेढ़ और बल खाती, झुलाती चली जाती रोज़ टिफिन वो.मुस्कुराती वो गांव की बेटी.. शहर की दुनियादारी से बेखबर…. चोटियों को झटक, इतरा कर लौटती है वो घर हर शाम.हां, देखती है वो भी सपने मन के मुट्ठी भर आकाश,और लिपट जाती मां से… मां फिर काजल लगाती है. 🍁🍁🍁🍁🍁

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आस्था..

तुझसे तो यूहीं बिखर गया था रंग इन पत्थरों पर,हमने भगवान समझ पूज डाला…। 🍁🍁🍁🍁🍁

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रूठना है, मनाना है…

सुनो,ये खत.. ये खत है।नहीं कोई कागज़ का पुलिंदा हैं।इन खतों में,तू इत्र है, महक है, अहसास है,बातें वो दर्ज़ जो तेरी खास हैं।इन खतों में,तू मतला है, मुक्तक है, छंद है,वो तेरे वादे, तेरे अनुबंध हैं।इन खतों में,तू गिला है, शिकवा है, शिकायत है,ऋचा है, चौपाई है, आयत है।इन खतों में,तू उम्मीद है, तू आरज़ू है,टूटे से मन की मज़बूत बाजू है।इन खतों में,तू है, तेरा रूठना है, मनाना है,कुछ सूखे गुलाब और गुज़रा ज़माना है। 🍁🍁🍁🍁🍁

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घर अच्छे नहीं लगते..!

सलीके से जमे घर अच्छे नहीं लगते,बच्चे न हो तो वो घर,घर नहीं लगते।फर्श पर भालू न खिलौने बिखरते अब,शहर की लगी लत, गांव अच्छे नहीं लगते।कच्चे घरों में रहता अब कौन है अब,कहां गहरी नींद, बुज़ुर्ग हर पल जगते अब।मुहल्ले में दौड़ते-भागते मासूमों का इंतज़ार…ओटले,सूने चौपाल पर ठहाके नहीं लगते अब।। 🍁🍁🍁🍁🍁

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