बिखरे पन्ने

समर्पित

शब्द-शब्द, अर्थ-अर्थ यही आस हो,रहे आशीष हर पल अहसास हो,मां सरस्वती, कृपा हम पर बनी रहे…मन हमारे उनका हरदम वास हो। 🍁🍁🍁🍁🍁 बसंत पंचमी की शुभकामनाएं- विवेक

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टुकड़ा-टुकड़ा प्यार

रोज़ होती है बच्चों जैसी मासूम सी होड़,सूरज के उठने से पहले उठ जाऊं मैं. चाहता हूं उसके गालों पर रौशनी के छूने से पहले छू लूं हथेली से उसके गाल और उठाऊं मैं… हराऊं मैं सूरज को और उठ जाऊं पहले मैं.हां। रोज़ होती है बच्चों जैसी मासूम सी होड़,सांझ होने तक यही भागदौड़… बातों का पुलिंदा लिए बैठते हैं दोनों,ये सुनाऊंगा, वो सुनूंगा.. उलझा उलझा सा मननहीं होती घंटों उससे बातें लगातार, कभी वो करे, तो कभी मैं करूं इंतज़ार…बढ़ रहा है फिर भी न जाने कैसे!जैसे टुकड़ा-टुकड़ा प्यार…। 🍁🍁🍁🍁🍁

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तेरे ख्यालों की पतंग

तेरे ख्यालों की पतंग गिरती अक्सर मेरे मन के आंगन में।ख़्वाहिश, ख़्वाब, बारिश, बूंदे..क्या-क्या न है जैसे पहले सावन में।उम्मीदों के आसमां में चाहत बढ़ चली,खुशियों के मोर नाचे जैसे कोई वन चंदन में.तेरे ख्यालों की पतंग गिरती अक्सर मेरे मन के आंगन में।🍁🍁🍁🍁🍁

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रूठ जाते हैं मन के किरदार

उसके इंतज़ार मैं बैठ जाता हूं…जैसे बैठ जाता है कोई अपने पसंदीदा सीरियल के इंतज़ार में..कितनी कल्पनाओं में डूब जाते हैं हम। उस सीरियल के दीवाने की तरह,और हम रच लेते हैं हमारे अनुसार न जाने कितने किरदार। सवाल हमारे और मासूम से जवाब भी हमारे..। पर नहीं बैठते हमारे अंदाज़ सहीऔर.. और न हीमन पसंदीदा किरदार इन बनाए सीरियलों में..। डायरेक्टर तय कर उलझा देता कहानी को.. न किरदार नज़र आते न वह हमारी कल्पनाओं से सजी कहानियां,शायद.. हां,यही हो रहा ज़िंदगी के सीरियल में हर रोज़.. कुछ कल्पनाओं में सजाते जिस ख़्वाब को,वह न ख़्वाब सच होता न वह किरदार नज़र आता। रूठ जाते हैं मन के किरदार..फिर समझ-समझाने में डूब जाता,मनाने में लग जाता मेरी ज़िंदगी के किरदार को। कभी मिले तो पूछूंगा मेरी ज़िंदगी के डायरेक्टर से…क्यों बनाया इतना ज़िंदगी का ये उलझा सीरियल..!! 🍁🍁🍁🍁🍁

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गुलकंद

तोड़ता हूं जब भी गुलाब की पंखुड़ियां,न जाने क्यूं..!ख्याल तेरा आते ही,हाथों में गुलकंद सी खुश्बू आती है। 🍁🍁🍁🍁🍁

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हक़ जताना

मायके में जैसे बेटी खुल जाती,वैसे रहना, तू हक़ जताना. जैसे इतराती थी मायके में,यहां भी इतराना, तू हक़ जताना. बांहों में आओ तो प्रेयसी बन जाना,और आओ जब ब्लेंकेट में..पत्नी बन जाना, तू हक़ जताना. 🍁🍁🍁🍁🍁

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गर्माहट

वो गर्माहट नहीं आ रही महंगे स्वेटर्स मेंपहन कर जैकेट्स कंपकपा रहा शरीर. याद आ रहे वो दिन,कैसे मां ने बना कर पहनाए.. अपने हाथों से वो स्वेटर्स. कैसे ऊन की लच्छियों से बनाती थी गोले. फंदे और फिर सर फंदे बना कर गिनती थी संख्या..सलाई में फंदों के साथ लेती थी मेरी कमर का नाप. हर रोज़ चढ़ते जाते फंदे ऊन के, लेने लगता आकारसाथ ही चढ़ता जाता मेरा उत्साह स्वेटर पहने का. नीला-सफ़ेद तो कभी हरा तो कभी खूबसूरत रंग गोले का.और मां पहनाती अपने हाथों से बना हुआ स्वेटर…सर्द हवाएं होने लगती बेअसर, हार कर लौट जाती.. देता था न जाने कैसी गर्माहट मां के हाथों से बना स्वेटर.वो गर्माहट नहीं आ रही शोरूम से ख़रीदे स्वेटर में. सर्द हवाओं में अब कुछ है तो सिर्फ यादों की गर्माहट…और बरसों पहले बुना मां के हाथों का स्वेटर. 🍁🍁🍁🍁🍁

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अंतस में बस जाना

बिखरे-बिखरे लफ़्ज़ों से वो गीत बनाती है,मन के झंकृत तारों से एहसास सुनाती है। धार टूटे पानी की.. झरना बनाती है,बिखर कर बूंदे इंद्रधनुषी हो जाती है। टूटते तारे को देख ख़्वाहिश मन में आती है,तेरी दुआओं में अक्सर हथेलियां जुड़ जाती है। सुनो…। तुम्हें पता है..कितना खुबसूरत होता है बिखर जाना,बादलों का बूंद बन कर यूं बरस जाना,प्यासी धरती में समा प्यास बुझाना। पिली पत्तियों का बिखर, शाखों से अलग हो जाना,नई कोपलों के लिए यूं जगह बन जाना। मन जब हो जाए भारी, पलकों पर आना,बिखर कर आंसू की गोली बन जाना। बिखरना है तो तुम बिखर जाना, पर..महकती हुई मेरे अंतस में बस जाना।

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खुशियों के मांडने

कितनी अलग थी,मेरे बचपन की दीवाली…!मां के आगे-पीछे दौड़ता था,जब वह लीपती थीमेरे घर का कच्चा आंगन,और ठीक करती थी “आलिया”दीये लगाने का…दो दिन पहले से बनाती थीवह गूंजे-चक्की और मिठाई. शाम होते ही देती जाती,वो दीये बाबूजी को…,औरवो जमाते थे एक-एक दीया मुंडेर पर…शाम होते ही रोशन हो जाता मेरा वो घर.हिदायतों के बाद मिलती थी,फुलझड़ियां और अनार और चकरी. मां फिर ले जाती,दूसरों के घर थाली में..दीये शगुन के और मिठाई. अब…!आकाश गंगा टांग दीअपनी चौथी मंज़िल के फ़्लैट पर,ले आया हूं कुछ किलो मिठाई,बाज़ार से सजे हुए डिब्बों में….बेटा लाया अपनी ज़िद सेपटाखे हज़ार के. इस बार फिर कर लूंगा पूजा,पार्किंग में खड़ी कार की. ऐसा ही कुछ नज़ारा हैमेरे फ़्लैट में कुछ साल से…कितना बदल गया मेरा और मेरे बेटे का बचपन..! कहां से लाऊं ?उसके लिए..!वो यादें, वो बातें,वो हिदायतें, वो लीपा कच्चा मकां,वो दीये, वो आंगन..और कच्चे मकान में,मां के बनाए खुशियों के मांडने. 🍁🍁🍁🍁🍁

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खिड़की

बढ़ रही रफ़्तार,सरपट हवाओं से बातें कर रही रेल…देख रहा हूं बाहर खिड़की सेबदला-बदला सा नज़ारा…।खेत खड़े वैसे ही अनमने से,लंबे-चौड़े खुले से मैदान,बिजली के बड़े-बड़े पोल,कुछ दूर-कुछ पास…धुआं उगलती चिमनियां।इस तेज़ हवाओं में…ढूंढ रहा हूं.…पुराने नज़ारे,कुछ पुरानी यादें…।जब बाबूजी ले जाते थे सफर पर।भाई से झगड़ते थे,खिड़की के लिए।रास आता खिड़की से बाहर का नज़ारा देखना…।गिनते थे वो भागते हुए हरे-घने पेड़,दौड़ते थे हमारे साथ वो टुकड़े बादल के…।चांद जैसे खिड़की में आ बैठता थाऔर पूछता था हमारे हाल।बीच-बीच में कोयला उड़ाती रेल।कुछ भी तो नहीं दिखा..!!बस खड़े हैं कुछ खेत अनमने से,पेड़ खजूर कुछ टूटे से।बकरियां बीच लकड़ी लिए खड़ा एक नन्हा सा।छोटी सी तलैया में दूर उड़ता बगुला सा।इस बीच रेल धीमे हो रही हो रही है..बताया जा रहा है,रस्ते चौड़े हो रहे हैं।पेड़ कट रहे हैं।ये वही पेड़ हैं जो कहते थे,बाबूजी जल्दी आना…।अब न पेड़ रहे,और न बाबूजी।रफ्तार के बीच हैरेल…खिड़की…औरनम सी मेरी आंखें। 🍁🍁🍁🍁🍁

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