रोज़ होती है बच्चों जैसी मासूम सी होड़,
सूरज के उठने से पहले उठ जाऊं मैं.
चाहता हूं उसके गालों पर रौशनी के छूने से पहले
छू लूं हथेली से उसके गाल और उठाऊं मैं…
हराऊं मैं सूरज को और उठ जाऊं पहले मैं.
हां। रोज़ होती है बच्चों जैसी मासूम सी होड़,
सांझ होने तक यही भागदौड़…
बातों का पुलिंदा लिए बैठते हैं दोनों,
ये सुनाऊंगा, वो सुनूंगा.. उलझा उलझा सा मन
नहीं होती घंटों उससे बातें लगातार,
कभी वो करे, तो कभी मैं करूं इंतज़ार…
बढ़ रहा है फिर भी न जाने कैसे!
जैसे टुकड़ा-टुकड़ा प्यार…।
🍁🍁🍁🍁🍁