रूठ जाते हैं मन के किरदार

उसके इंतज़ार मैं बैठ जाता हूं…
जैसे बैठ जाता है कोई अपने पसंदीदा सीरियल के इंतज़ार में..
कितनी कल्पनाओं में डूब जाते हैं हम।

उस सीरियल के दीवाने की तरह,
और हम रच लेते हैं हमारे अनुसार न जाने कितने किरदार।

सवाल हमारे और मासूम से जवाब भी हमारे..।

पर नहीं बैठते हमारे अंदाज़ सही
और.. और न ही
मन पसंदीदा किरदार इन बनाए सीरियलों में..।

डायरेक्टर तय कर उलझा देता कहानी को..

न किरदार नज़र आते न वह हमारी कल्पनाओं से सजी कहानियां,
शायद.. हां,
यही हो रहा ज़िंदगी के सीरियल में हर रोज़..

कुछ कल्पनाओं में सजाते जिस ख़्वाब को,
वह न ख़्वाब सच होता न वह किरदार नज़र आता।

रूठ जाते हैं मन के किरदार..
फिर समझ-समझाने में डूब जाता,
मनाने में लग जाता मेरी ज़िंदगी के किरदार को।

कभी मिले तो पूछूंगा मेरी ज़िंदगी के डायरेक्टर से…
क्यों बनाया इतना ज़िंदगी का ये उलझा सीरियल..!!

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