वो गर्माहट नहीं आ रही महंगे स्वेटर्स में
पहन कर जैकेट्स कंपकपा रहा शरीर.
याद आ रहे वो दिन,
कैसे मां ने बना कर पहनाए.. अपने हाथों से वो स्वेटर्स.
कैसे ऊन की लच्छियों से बनाती थी गोले.
फंदे और फिर सर फंदे बना कर गिनती थी संख्या..
सलाई में फंदों के साथ लेती थी मेरी कमर का नाप.
हर रोज़ चढ़ते जाते फंदे ऊन के, लेने लगता आकार
साथ ही चढ़ता जाता मेरा उत्साह स्वेटर पहने का.
नीला-सफ़ेद तो कभी हरा तो कभी खूबसूरत रंग गोले का.
और मां पहनाती अपने हाथों से बना हुआ स्वेटर…
सर्द हवाएं होने लगती बेअसर, हार कर लौट जाती..
देता था न जाने कैसी गर्माहट मां के हाथों से बना स्वेटर.
वो गर्माहट नहीं आ रही शोरूम से ख़रीदे स्वेटर में.
सर्द हवाओं में अब कुछ है तो सिर्फ यादों की गर्माहट…
और बरसों पहले बुना मां के हाथों का स्वेटर.
🍁🍁🍁🍁🍁