खुशियों के मांडने

कितनी अलग थी,
मेरे बचपन की दीवाली…!
मां के आगे-पीछे दौड़ता था,
जब वह लीपती थी
मेरे घर का कच्चा आंगन,
और ठीक करती थी “आलिया”
दीये लगाने का…
दो दिन पहले से बनाती थी
वह गूंजे-चक्की और मिठाई.

शाम होते ही देती जाती,
वो दीये बाबूजी को…,
और
वो जमाते थे एक-एक दीया मुंडेर पर…
शाम होते ही रोशन हो जाता मेरा वो घर.
हिदायतों के बाद मिलती थी,
फुलझड़ियां और अनार और चकरी.

मां फिर ले जाती,
दूसरों के घर थाली में..
दीये शगुन के और मिठाई.

अब…!
आकाश गंगा टांग दी
अपनी चौथी मंज़िल के फ़्लैट पर,
ले आया हूं कुछ किलो मिठाई,
बाज़ार से सजे हुए डिब्बों में….
बेटा लाया अपनी ज़िद से
पटाखे हज़ार के.

इस बार फिर कर लूंगा पूजा,
पार्किंग में खड़ी कार की.

ऐसा ही कुछ नज़ारा है
मेरे फ़्लैट में कुछ साल से…
कितना बदल गया मेरा और मेरे बेटे का बचपन..!

कहां से लाऊं ?
उसके लिए..!
वो यादें, वो बातें,
वो हिदायतें, वो लीपा कच्चा मकां,
वो दीये, वो आंगन..
और कच्चे मकान में,
मां के बनाए खुशियों के मांडने.

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