पिछले दिनों दीपोत्सव और गोर्धन पूजन पर्व संपन्न हुए।
इस पर्व के साथ देश के कई हिस्सों में स्थित धार्मिक स्थल मंदिर व अन्य जगह “अन्नकूट” का आयोजन भी हुआ।
मंदिरों में अन्नकूट आयोजन के प्रति आस्था और भव्यता देखते बनती है।
श्रद्धालु सैकड़ों की संख्या में हैं जो गोर्धन पूजन,मंदिरों में अन्नकूट के दर्शन और प्रसाद ग्रहण करने जाते हैं।
परंतु इनमें कई श्रद्धालु ऐसे भी होंगे जो अन्नकूट के इस भाव और पौराणिक परंपरा को न जानते हों।
मेरी मुलाकात एक 10 वीं में अध्ययनरत छात्र दक्षेश पटेल,इंदौर से हुई।
अध्यात्म-अध्ययन में रुचि रखने वाले दक्षेश ने बहुत सुंदर तरीके से “अन्नकूट” के महत्व को समझाया।
मास्टर दक्षेश कहते है-
“पौराणिक मान्यताओं में,उपनिषद में उल्लेखित है अन्नकूट..और महत्व।
वृंदावन में कुछ भक्तों ने इंद्र देवता के पूजन करने को कहा।
बताया जाता है भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन वासियों को कहा-‘आप गोवर्धन की पूजा कीजिए।’
तभी से गोबर के लेप से तैयार गोवर्धन की पूजा और गाय-बैल की पूजा का महत्व बताया।
साथ ही आप ईश्वर के सामने आस्था से अन्नकूट का प्रसाद चढ़ाइए।
व्याख्या है-“अन्नकूट यानी इस शब्द में कूट का अभिप्राय पहाड़/पर्वत…”अन्न का पर्वत”।
ईश्वर के समक्ष एक ऐसी पर्वतनुमा रचना जो विभिन्न अन्न(वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कई तरह के व्यंजन)से तैयार की गई हो।ये व्यंजन अन्न हरि भक्त,परिवार ही तैयार अमूमन करते हैं।
इस अति आकर्षक तरीके से सजाकर भव्यता दी जाती है।पूजा के बाद अन्नकूट भोजन प्रसादी का वितरण..।इस प्रसाद को पूर्ण ग्रहण किया जाता है।छोड़ा नहीं जाता।
इस पूरे प्रसंग में दो बात समझ आई।
पहला ईश्वर के प्रति प्राकृतिक कृतज्ञता।
इस समय अन्न की भरपूर आवक के साथ ईश्वर के माध्यम से उत्सव का स्वरूप दिया गया।
दूसरा वृंदावन से शुरु हुई सम्भवतः यह परंपरा आज विश्वव्यापी हो गई।
दक्षेश ने अपनी अपेक्षाकृत कम उम्र होने के बावजूद अन्नकूट और उसके महत्व को विस्तृत सुनाया।
साथ ही इंसान,ईश्वरीय अवतार,ईश्वर,माया,ब्रम्ह और परम् ब्रम्ह की साधना…इस धार्मिक यात्रा को बखूबी बताया।
ये पर्व, ये उत्सव और नई पीढ़ी का रुझान एक सुखद संकेत है।
स्वामी नारायण भगवान की कृपा बनी रहे।