गर्म हवा, पतझड़ में खिल गए पलाश हैं,
हो गई मन की पूजा,पढ़ ली नमाज़ है.
तितलियों के पंखों पर देख ली चित्रकारी,
देख बूंदें ओस की कलियां भी मुस्कुरा ली.
हो गई मन की पूजा…
सागर की लहरों में ज़िंदगी है जो तिनका,
कैसा भंवर, कैसी फिकर, जो वही पतवार है.
हो गई मन की पूजा…
जाती रही दिनभर की थकन,
बेटी जो शाम कंधे पर सवार है.
हो गई मन की पूजा…
न देखा काबा, न देखा शिवाला,
देखूं मजदूर का बेटा वही मुरली, वही कन्हाई है.
हो गई मन की पूजा…
फंसती है ज़िंदगी, उखड़ती है सांसे
उदासी में रख देता कांधे पर कोई हाथ है.
हो गई मन की पूजा….पढ़ ली नमाज़ है.
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