कर रहा हूं बागवानी आजकल,
रिश्तों के बगिया की…
तोड़ रहा सूखे पत्ते रिश्तों के.
और,
काट दी कई टहनियां जो बन रही थी बाधाएं
हटा दी मैंने क्यारियों की खर-पतवार,
जो पनप ने नहीं दे रही महकते रिश्तें को.
सड़ांध मारने लगे थे ये सूखे पत्ते और उलझी शाखाएं.
हटा दी हरी काई जहां फिसलने लगे भरोसे के पैर…
इस छटाईं से दिखने लगा खूबसूरत रिश्तों का बगीचा.
खिलने लगे संवादों के फूल,मुस्कान की कलियां…
महकने लगा बगीचा जैसे कोई महके जूही-मोगरा और रजनीगंधा
जैसे कोई खड़ा हो गुलाबों सा रिश्तों का गुलदाता लिए
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