मन का वास्तु !

4 साल का मासूम बेटा रोज़ लौटता है स्कूल से,
कर देता मां की हिदायतों को दरकिनार.
ले आता आधा खाली आधा भरा टिफिन.
होम वर्क का पूछते ही निकाल लेता रंगीन पेंसिलें..
और बन जाता है टीचर.
चढ़ जाता है बेड पर नन्हें पैरों से..
और चितरने लगता दीवारों को.
अरे..अरे ! अभी तो कराया कलर दीवारों पर,
पलटता वो मासूम और टीचर की छवि में चुप करा देता है मुझे.
चमकती दीवारों पर रोज़ चितरता…
बना देता है मन चाहे नक़्शे.
कभी तितली तो कभी खिलता गुलाब…
कभी बना देता टेड़ा-मेढ़ा सा कृष्ण का मोर पंख.
भूल जाता हूं मैं कलर का हिसाब,बिल और सब कुछ…
गले लगता है और जैसे ठीक कर रहा वो मन का वास्तु.

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