तेरे ख्यालों की पतंग गिरती अक्सर मेरे मन के आंगन में।
ख़्वाहिश, ख़्वाब, बारिश, बूंदे..
क्या-क्या न है जैसे पहले सावन में।
उम्मीदों के आसमां में चाहत बढ़ चली,
खुशियों के मोर नाचे जैसे कोई वन चंदन में.
तेरे ख्यालों की पतंग गिरती अक्सर मेरे मन के आंगन में।
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