घर अच्छे नहीं लगते..!

सलीके से जमे घर अच्छे नहीं लगते,
बच्चे न हो तो वो घर,घर नहीं लगते।
फर्श पर भालू न खिलौने बिखरते अब,
शहर की लगी लत, गांव अच्छे नहीं लगते।
कच्चे घरों में रहता अब कौन है अब,
कहां गहरी नींद, बुज़ुर्ग हर पल जगते अब।
मुहल्ले में दौड़ते-भागते मासूमों का इंतज़ार…
ओटले,सूने चौपाल पर ठहाके नहीं लगते अब।।

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