खिड़की

बढ़ रही रफ़्तार,
सरपट हवाओं से बातें कर रही रेल…
देख रहा हूं बाहर खिड़की से
बदला-बदला सा नज़ारा…।
खेत खड़े वैसे ही अनमने से,
लंबे-चौड़े खुले से मैदान,
बिजली के बड़े-बड़े पोल,
कुछ दूर-कुछ पास…
धुआं उगलती चिमनियां।
इस तेज़ हवाओं में…
ढूंढ रहा हूं.…
पुराने नज़ारे,कुछ पुरानी यादें…।
जब बाबूजी ले जाते थे सफर पर।
भाई से झगड़ते थे,
खिड़की के लिए।
रास आता खिड़की से बाहर का नज़ारा देखना…।
गिनते थे वो भागते हुए हरे-घने पेड़,
दौड़ते थे हमारे साथ वो टुकड़े बादल के…।
चांद जैसे खिड़की में आ बैठता था
और पूछता था हमारे हाल।
बीच-बीच में कोयला उड़ाती रेल।
कुछ भी तो नहीं दिखा..!!
बस खड़े हैं कुछ खेत अनमने से,
पेड़ खजूर कुछ टूटे से।
बकरियां बीच लकड़ी लिए खड़ा एक नन्हा सा।
छोटी सी तलैया में दूर उड़ता बगुला सा।
इस बीच रेल धीमे हो रही हो रही है..
बताया जा रहा है,
रस्ते चौड़े हो रहे हैं।
पेड़ कट रहे हैं।
ये वही पेड़ हैं जो कहते थे,
बाबूजी जल्दी आना…।
अब न पेड़ रहे,
और न बाबूजी।
रफ्तार के बीच है
रेल…खिड़की…और
नम सी मेरी आंखें।

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