अंतस में बस जाना

बिखरे-बिखरे लफ़्ज़ों से वो गीत बनाती है,
मन के झंकृत तारों से एहसास सुनाती है।

धार टूटे पानी की.. झरना बनाती है,
बिखर कर बूंदे इंद्रधनुषी हो जाती है।

टूटते तारे को देख ख़्वाहिश मन में आती है,
तेरी दुआओं में अक्सर हथेलियां जुड़ जाती है।

सुनो…। तुम्हें पता है..
कितना खुबसूरत होता है बिखर जाना,
बादलों का बूंद बन कर यूं बरस जाना,
प्यासी धरती में समा प्यास बुझाना।

पिली पत्तियों का बिखर, शाखों से अलग हो जाना,
नई कोपलों के लिए यूं जगह बन जाना।

मन जब हो जाए भारी, पलकों पर आना,
बिखर कर आंसू की गोली बन जाना।

बिखरना है तो तुम बिखर जाना, पर..
महकती हुई मेरे अंतस में बस जाना।

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